
झौली पासवान
देशक गुणगहवर/ होमय दियौ प्रलय
देशक गुणगहवर
जै माटिक कण-कण ललित चानन लिलारक,
गुंजायमान सर्वत्र विश्व भरि सुयश बिहारक।
आस्थाक जे केन्द्र, देशक उन्नत ललाट के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
गौरवशाली अछि अतीत अप्पन बिहारक,
ज्ञान-विज्ञानक केन्द्र, केन्द्र जे राजनीतिक।
सभ्यता, संस्कृति आ जनजनक उत्तम विचार के,
झुकि नमन करी अई देशक गुणगहवर बिहार के।
सम्राट हास्य कवि गोनू झा, कवि कोकिल विद्यापति महान,
उगना रूप धरौलनि शंकर के नहि जानय सकल जहान।
यशोगान भय रहल विश्व भरि मिथिला पेन्टींग के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
अतिथि होइछ भगवान जतय सिद्धान्त मेटत नइ दोसरठाम,
मिथि के मिथिला राज्य एत्तई गौतम पौलनि ज्ञान।
त्रिनद चर्चित कोशी, कमला, आ बलान के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
बरबस खींचय ध्यान मेला सोनपुरक विख्यात,
बरबस खींचय ध्यान एतुक्का तीर्थ गयाजी धाम।
जक्कर विकसित भाल विकसित बहुविधि कला निधान के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
बलिदानीक ई गहवर रहवर विद्वानक युग-युग सँ,
हृदय शोक, तरुवर अशोक, बढ़ाबय गामक शोभा।
बरगद, नीम, पीपर पूजित पुण्य भूमि जे बुद्ध के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
युग-युग बँटलक ज्ञान जगत के, ज्ञान केन्द्र नालन्दा,
आर्यभट्ट गणितज्ञ के के नहि जानय सकल जहान।
पुण्य भूमि राजेन्द्र प्रसादक धरती वीर कुँवर सिंह के,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
उर्वर जतुक्का माटि, श्रमशील जतय मजदूर-किसान,
जतय अहर्निश प्रकृति पूजा, प्रकृति जतय भगवान।
मर्यादा सँ बान्हल जतुक्का बात आओर व्यवहार,
झुकि नमन करी अई देशक राज्य बिहार के।
२
होमय दियौ प्रलय
होमय दियौ प्रलय, सगुण निर्गुण सभ एक्के,
नाचि रहल ब्रह्माण्ड, चराचर शान्त निछक्के।
लख चौरासी जीव, कहू ई के देखलक अछि,
आवागमनक काल कहू ई के जनलक अछि।
जीव-जीव सभ एक्के, जीवन आशा एक्के,
लघु, बृहद, प्रभु वर्ग, प्रभृत सभ जाति निछक्के।
अनुपम जीवन शृंखला, जीवे पर आश्रित जीव,
क्षमा, दया, तप, त्याग ई हितकर सम्बल अछि।
अण्डज हो वा पिण्डज, जीव ई दुन्नू एक्के,
तैयो लक्षित अन्तर दुहू दू जाति निछक्के।
सभ शोषक एक्के जाति विजातिकेँ के चिन्हलक अछि,
स्वार्थक पोटरी बान्हि सभकेँ सभ ठकलक अछि।
कर्म जीवनाधार मनुक्खक जाति अछि एक्के,
मनुक्ख मनुक्खमे भेद करय, शोषक वर्ग निछक्के।
सम्मुख मिठगर बात, बसन भाड़ी-भरकम,
नहि खीरा नहि काँकरि भीतरके देखलक अछि?।
दिल मिलला सँ भावदियादी झूठ साँच सभ एक्के,
पड़िते दरारि टूटि गेल आड़ि, दियादी दुश्मन बुनल निछक्के।
उपजल विकृत भाव विचार, नीको भेल बाँतर,
कहियो ककरोसँ कम अपनाकेँ के बुझलक अछि।
लागल चोट पर चोट, तखने टूटल निन्न अचक्के,
ओकरा जनैत हमरेमे छल सभ दुर्गुण भरल निछक्के।
उपरतक्के बनल सभ देखत के जमीन के,
बाहरे सभ दिन नजरि सभकेँ भीतरके देखलक अछि?
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